अलविदा सुरेश गंगवाल, ‘मैं बदलकर लिबास आता हूँ, जिंदगी इंतज़ार करो मेरा’- नरेन्द्र वेद नकुल पाटोदी

आपकी मृत्यु से कोई चेतावनी नहीं है।
माल सौ साल पुराना है और अभी नहीं।

ये शेर शायद सुरेश गंगवाल के शायर बाबू साहब ने लिखा होगा, शाम को शिवरात्रि को अपने अंदाज में मनाया उनका जन्मदिन, फोन पर बधाइयों का हुजूम, अपनी भाषा में कहा, बधाई देना है तो बस आ जाओ घर…, पूरे हर्षोल्लास के साथ रात को विश्राम करने चले गए, सुबह बादशाह ने बेशर्मी से अपनी बात कहने वाले बाबू साहब को, अपने ही अंदाज में अपने शरीर को भी बदल लिया और सा-

मैं कपड़े बदलता हूं।
मेरे जीवन रुको

बाबू साहब इंदौर के सेठ शहर के समय से शहर के बारे में राजनीतिक, व्यावसायिक, पत्रकारिता, प्रशासनिक, प्राचीन भौगोलिक और सामाजिक जानकारी का एक विश्वकोश थे। उन्होंने हर विषय पर बेबाकी से बात की और छोड़ने का नाम नहीं लिया। वे एक ऐसे व्यक्ति थे, जिनकी अपने समय की सभी राजनीतिक पार्टियों पर सीधी पकड़ थी, नेता चाहे कितने भी महान क्यों न हों, अपने अंदाज में ही हलचल मचाते थे। श्री स्पोर्ट्स क्लब के माध्यम से खेलों के संपर्क में रहें।

कुल मिलाकर, बाबूसाहेब एक दुर्लभ व्यक्तित्व थे और शहर में एकमात्र परिवार बाबूसाहेब कहलाता था। बाबू साहब के पिता श्री राजकुमार जी को बाबूसाहेब के नाम से भी जाना जाता था, बाबूसाहेब ने इसे बनाए रखा, अब उनके पुत्रों को छोटे बाबूसाहेब और बड़े बाबूसाहेब के नाम से भी जाना जाता है, शायद पोते-पोतियों को भी जाना जाता है। यह परिवार मि.

बाबूसाहेब मेरे पिता दादा रतन पटोदी के अभिन्न मित्र थे, जब दोनों बैठते थे तो गपशप का सिलसिला जमा हो जाता था।
बाबू साहब का आकस्मिक निधन अत्यंत दुखद है, ईश्वर उनके चरणों में स्थान दें।

नरेंद्र वेद
नकुल पटोदी

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